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मां

तुम ना होकर भी तुम जैसी हूं मैं मां।
स्वयं को तुम्हारा प्रतिबिंब पाती हूं मैं मां।

तुम में है आकाश सी स्पष्टता व सागर की विशालता,
सागर तो नहीं,

पर किनारे आती लहरों सम चंचल खुद को पाती हूं मै मां।

समय सी अथक आगे बढ़ती हो मां,
फूलों की महक और सौम्यता बिखेरती हो मां।
मां से दादी नानी मां बनकर भी
बिना थके, निस्वार्थ सबके लिऐ जीती हो मां।

तुम जैसा वीशाल हृदय तो नहीं मेरा,
ना तुम जैसी सहनशील हूं मैं
इसीलिए शायद जीवन के हर मोड़ पर
थक कर, हार कर तुम को ही ढूंढती हूं मै मां।

तुम ना होकर भी तुम जैसी हूं मैं मां।
स्वयं को तुम्हारा प्रतिबिंब पाती हूं मैं मां।

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Yours Anonymously

She was loved by her family but was often belittled for not having a career. The highly accomplished family often scorned at her under-performance. She became disconnected with all, lost in her own world. The only thing that gave her happiness was her time on phone. 
She would finish the chores at home and run to her phone, take it everywhere she went.

Her family often questioned her about her fixation with the phone, “They know me there” she would silently say.
Social media opened her door to a world that loved her for her thoughts, imagination. She was a popular writer, writing with a pseudo name, who her followers including her family adored. 
Saying “They know me there”, she smiled!

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ये बरतन

 

अब दिन में दरवाजे खुले रखे नहीँ जाते
घंटी बजे तो
आहिस्ता से देखा जाता है आया कौन है।

अब पड़ोसियों को खास पकवान नहीं भेजे जाते
शायद इसीलिए बरतनों में नाम नहीं गुदवाए जाते ।

बरतन अब कांच के हो गये हैं
रिश्ते भी तो कुछ कांच से कमज़ोर हो चले हैं ।

स्टील का वो टिफ़िन बताता है कि आया था बरसों पहले
पापा के जन्मदिन पर,
जब भी नज़र पड़ती है, मुसकान आती है चेहरे पर ।
सब पड़ोस घूम कर, अपने ही घर वापस आता था वो डिब्बा।

पर कांच की ये कटोरिंया, बेचारी कहीं जाती ही नहीं।
बस शान से टेबल पर सज जाती हैं,
वो हमें ताकती हैं, और हम उन्हें ।।

 

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किश्तों में ज़िन्दगी

रात के सन्नाटे में घड़ी की टिक-टिक अक्सर अहसास देती है,

इस खामोशी से अच्छा साथ तुम्हारे खर्राटों का था!!

जाते हुए मुझे उदास देख
अक्सर तुम मुसकुरा के कहते,
ये आशियां तो  तुम्हारा है ही
अब हमारा ये बिस्तर भी पूरा तुम्हारा

पर  जब से  गए हो तुम
पलंग का वो खाली हिस्सा भी तुमको ही ढूंढता है,
मेरी तरह शायद इसको भी है आदत तुम्हारी

काश तुम समझ पाते
हमारे होने से ही है ये आशियां हमारा पूरा
तुम्हारे बिन अधूरा है ये जहाँ मेरा, ये आशियां हमारा

ये खामोश दीवारें भी अब मानतीं है
इस सन्नाटे से अच्छा तुम्हारा फ़िज़ूल बैठना
और उस पर शोर मेरी किट-किट का था

रात के सन्नाटे में घड़ी की टिक-टिक अक्सर अहसास देती है, इस खामोशी से अच्छा साथ तुम्हारे खर्राटों का था!!

तुम्हारे जाते ही शुरू होता है इंतजार तुम्हारे आने का,
आदत हो गयी है अब मुझे भी किश्तो मे जीने की, जिंदगी निभाने की।।

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Sleeping Beauty

 

Newly wed Anamika looked lovely in the bright outfits adorning her slender frame.

She often slept longer than expected and her new family called her lazy, but her husband didn’t mind; he happily snuggled up next to her.

With each passing day she slept longer and longer until one day she was found perfectly still with a bottle of pills.

Her dreams were a place she met her lover, relived the past and fulfilled her desire.

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