Browse Category by muse
muse, My musings, Uncategorized

मां

तुम ना होकर भी तुम जैसी हूं मैं मां।
स्वयं को तुम्हारा प्रतिबिंब पाती हूं मैं मां।

तुम में है आकाश सी स्पष्टता व सागर की विशालता,
सागर तो नहीं,

पर किनारे आती लहरों सम चंचल खुद को पाती हूं मै मां।

समय सी अथक आगे बढ़ती हो मां,
फूलों की महक और सौम्यता बिखेरती हो मां।
मां से दादी नानी मां बनकर भी
बिना थके, निस्वार्थ सबके लिऐ जीती हो मां।

तुम जैसा वीशाल हृदय तो नहीं मेरा,
ना तुम जैसी सहनशील हूं मैं
इसीलिए शायद जीवन के हर मोड़ पर
थक कर, हार कर तुम को ही ढूंढती हूं मै मां।

तुम ना होकर भी तुम जैसी हूं मैं मां।
स्वयं को तुम्हारा प्रतिबिंब पाती हूं मैं मां।

muse, My musings

ये बरतन

 

अब दिन में दरवाजे खुले रखे नहीँ जाते
घंटी बजे तो
आहिस्ता से देखा जाता है आया कौन है।

अब पड़ोसियों को खास पकवान नहीं भेजे जाते
शायद इसीलिए बरतनों में नाम नहीं गुदवाए जाते ।

बरतन अब कांच के हो गये हैं
रिश्ते भी तो कुछ कांच से कमज़ोर हो चले हैं ।

स्टील का वो टिफ़िन बताता है कि आया था बरसों पहले
पापा के जन्मदिन पर,
जब भी नज़र पड़ती है, मुसकान आती है चेहरे पर ।
सब पड़ोस घूम कर, अपने ही घर वापस आता था वो डिब्बा।

पर कांच की ये कटोरिंया, बेचारी कहीं जाती ही नहीं।
बस शान से टेबल पर सज जाती हैं,
वो हमें ताकती हैं, और हम उन्हें ।।

 

#mymuse
#hindipoetry #growingupin90s
#njmmusings #njmwrites

hindi, muse, poetry, poetrybyrashmi

ख्वाब poetry by Rashmi

कुछ कुछ याद .. कुछ भूला सा ख्वाब लगता है
धुंद मे लिपटे हुए शीशों पे जैसे.. अपनी उँगलियों से अनगिनत ख्याल फेरे हो मैंने..
और फिर एक पानी की बौछार मे समा के लगें हों वो बहने..

सब कुछ अधूरा सा दिखता है..
रेत के टीलों की उम्र सा नाज़ुक
करवटों के बदलने से कहीं छूटा हुआ
चादरों की सिलवटों पर बिखरा ख्वाब लगता है
कुछ कुछ याद ..कुछ भूला सा ख्वाब लगता है ..

याद करने को दे गए जैसे तुम बहुत कुछ्..
और कुछ भी नही…
एक पल में साथ ले गए सब..
कुछ बातें, उन मुलाकातों से बनी ये यादे
लेकिन अब सब कुछ अधूरा सा लगता है कुछ याद .. कुछ कुछ भूला सा ख्वाब लगता है