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ये बरतन

 

अब दिन में दरवाजे खुले रखे नहीँ जाते
घंटी बजे तो
आहिस्ता से देखा जाता है आया कौन है।

अब पड़ोसियों को खास पकवान नहीं भेजे जाते
शायद इसीलिए बरतनों में नाम नहीं गुदवाए जाते ।

बरतन अब कांच के हो गये हैं
रिश्ते भी तो कुछ कांच से कमज़ोर हो चले हैं ।

स्टील का वो टिफ़िन बताता है कि आया था बरसों पहले
पापा के जन्मदिन पर,
जब भी नज़र पड़ती है, मुसकान आती है चेहरे पर ।
सब पड़ोस घूम कर, अपने ही घर वापस आता था वो डिब्बा।

पर कांच की ये कटोरिंया, बेचारी कहीं जाती ही नहीं।
बस शान से टेबल पर सज जाती हैं,
वो हमें ताकती हैं, और हम उन्हें ।।

 

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ख्वाब poetry by Rashmi

कुछ कुछ याद .. कुछ भूला सा ख्वाब लगता है
धुंद मे लिपटे हुए शीशों पे जैसे.. अपनी उँगलियों से अनगिनत ख्याल फेरे हो मैंने..
और फिर एक पानी की बौछार मे समा के लगें हों वो बहने..

सब कुछ अधूरा सा दिखता है..
रेत के टीलों की उम्र सा नाज़ुक
करवटों के बदलने से कहीं छूटा हुआ
चादरों की सिलवटों पर बिखरा ख्वाब लगता है
कुछ कुछ याद ..कुछ भूला सा ख्वाब लगता है ..

याद करने को दे गए जैसे तुम बहुत कुछ्..
और कुछ भी नही…
एक पल में साथ ले गए सब..
कुछ बातें, उन मुलाकातों से बनी ये यादे
लेकिन अब सब कुछ अधूरा सा लगता है कुछ याद .. कुछ कुछ भूला सा ख्वाब लगता है