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मां

तुम ना होकर भी तुम जैसी हूं मैं मां।
स्वयं को तुम्हारा प्रतिबिंब पाती हूं मैं मां।

तुम में है आकाश सी स्पष्टता व सागर की विशालता,
सागर तो नहीं,

पर किनारे आती लहरों सम चंचल खुद को पाती हूं मै मां।

समय सी अथक आगे बढ़ती हो मां,
फूलों की महक और सौम्यता बिखेरती हो मां।
मां से दादी नानी मां बनकर भी
बिना थके, निस्वार्थ सबके लिऐ जीती हो मां।

तुम जैसा वीशाल हृदय तो नहीं मेरा,
ना तुम जैसी सहनशील हूं मैं
इसीलिए शायद जीवन के हर मोड़ पर
थक कर, हार कर तुम को ही ढूंढती हूं मै मां।

तुम ना होकर भी तुम जैसी हूं मैं मां।
स्वयं को तुम्हारा प्रतिबिंब पाती हूं मैं मां।

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