muse, My musings

ये बरतन

 

अब दिन में दरवाजे खुले रखे नहीँ जाते
घंटी बजे तो
आहिस्ता से देखा जाता है आया कौन है।

अब पड़ोसियों को खास पकवान नहीं भेजे जाते
शायद इसीलिए बरतनों में नाम नहीं गुदवाए जाते ।

बरतन अब कांच के हो गये हैं
रिश्ते भी तो कुछ कांच से कमज़ोर हो चले हैं ।

स्टील का वो टिफ़िन बताता है कि आया था बरसों पहले
पापा के जन्मदिन पर,
जब भी नज़र पड़ती है, मुसकान आती है चेहरे पर ।
सब पड़ोस घूम कर, अपने ही घर वापस आता था वो डिब्बा।

पर कांच की ये कटोरिंया, बेचारी कहीं जाती ही नहीं।
बस शान से टेबल पर सज जाती हैं,
वो हमें ताकती हैं, और हम उन्हें ।।

 

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